अवकहडा चक्र
२७ नक्षत्रका १० वटै स्तम्भ — स्वामी, जात, संज्ञा/मुख, नामाक्षर, राशि / स्वामी, राशि वर्ण/वश्य, योनि / वैरी योनि, गण र नाडी।
अभिजित् — उत्तराषाढाको चौथो पाउ र श्रवणको सुरुको १५ भागमध्ये १ भाग मिलेर बन्ने अन्तरकालीन (२८औँ) नक्षत्र हो; नामाक्षर: जु, जे, जो, ख।
| नक्षत्र | स्वामी | जात | संज्ञा/मुख | नामाक्षर (चरण १–४) | राशि / स्वामी | राशि वर्ण/वश्य | योनि / वैरी योनि | गण | नाडी |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
1. अश्विनी | केतु | वैश्य | लघु / तिर्यङ् | चूचेचोला | मेष (मंगल) | क्षत्रिय / चतुष्पद | घोडा / राँगो | देव | आद्य |
2. भरणी | शुक्र | चाण्डाल | उग्र / अधो | लीलूलेलो | मेष (मंगल) | क्षत्रिय / चतुष्पद | हात्ती / सिंह | नर | मध्य |
3. कृत्तिका | सूर्य | ब्राह्मण | मिश्र / अधो | अईउए | मेष / वृष (मंगल / शुक्र) | क्षत्रिय / वैश्य (चतुष्पद) | बोका / बाँदर | राक्षस | अन्त्य |
4. रोहिणी | चन्द्र | शूद्र | ध्रुव / ऊर्ध्व | ओवावीवू | वृष (शुक्र) | वैश्य / चतुष्पद | सर्प / नकुल | नर | अन्त्य |
5. मृगशिरा | मंगल | कृषक | मृदु / तिर्यङ् | वेवोकाकी | वृष / मिथुन (शुक्र / बुध) | वैश्य / शूद्र (चतुष्पद / द्विपद) | सर्प / नकुल | देव | मध्य |
6. आर्द्रा | राहु | कूरजाति | तीक्ष्ण / ऊर्ध्व | कुघङछ | मिथुन (बुध) | शूद्र / द्विपद | कुकुर / हरिण | नर | आद्य |
7. पुनर्वसु | गुरु | वैश्य | चर / तिर्यङ् | केकोहाही | मिथुन / कर्कट (बुध / चन्द्र) | शूद्र / विप्र (द्विपद / जलचर) | बिरालो / मुसा | देव | आद्य |
8. पुष्य | शनि | क्षत्रिय | लघु / ऊर्ध्व | हुहेहोडा | कर्कट (चन्द्र) | विप्र / जलचर | बोका / बाँदर | देव | मध्य |
9. आश्लेषा | बुध | चाण्डाल | तीक्ष्ण / अधो | डीडूडेडो | कर्कट (चन्द्र) | विप्र / जलचर | बिरालो / मुसा | राक्षस | अन्त्य |
10. मघा | केतु | शूद्र | उग्र / अधो | मामीमूमे | सिंह (सूर्य) | क्षत्रिय / वनचर | मुसा / बिरालो | राक्षस | अन्त्य |
11. पूर्वाफाल्गुनी | शुक्र | ब्राह्मण | उग्र / अधो | मोटाटीटू | सिंह (सूर्य) | क्षत्रिय / वनचर | मुसा / बिरालो | नर | मध्य |
12. उत्तराफाल्गुनी | सूर्य | क्षत्रिय | ध्रुव / ऊर्ध्व | टेटोपापी | सिंह / कन्या (सूर्य / बुध) | क्षत्रिय / वैश्य (वनचर / द्विपद) | गाई / बाघ | नर | आद्य |
13. हस्त | चन्द्र | वैश्य | लघु / तिर्यङ् | पूषणठ | कन्या (बुध) | वैश्य / द्विपद | राँगो / घोडा | देव | आद्य |
14. चित्रा | मंगल | कृषक | मृदु / तिर्यङ् | पेपोरारी | कन्या / तुला (बुध / शुक्र) | वैश्य / शूद्र (द्विपद) | बाघ / गाई | राक्षस | मध्य |
15. स्वाती | राहु | कूरजाति | चर / तिर्यङ् | रूरेरोता | तुला (शुक्र) | शूद्र / द्विपद | राँगो / घोडा | देव | अन्त्य |
16. विशाखा | गुरु | चाण्डाल | मिश्र / अधो | तीतूतेतो | तुला / वृश्चिक (शुक्र / मंगल) | शूद्र / विप्र (द्विपद / कीट) | बाघ / गाई | राक्षस | अन्त्य |
17. अनुराधा | शनि | शूद्र | मृदु / तिर्यङ् | नानीनूने | वृश्चिक (मंगल) | विप्र / कीट | हरिण / कुकुर | देव | मध्य |
18. ज्येष्ठा | बुध | कृषक | तीक्ष्ण / तिर्यङ् | नोयायीयू | वृश्चिक (मंगल) | विप्र / कीट | हरिण / कुकुर | राक्षस | आद्य |
19. मूल | केतु | कूरजाति | तीक्ष्ण / अधो | येयोभाभी | धनु (गुरु) | क्षत्रिय / द्विपद | कुकुर / हरिण | राक्षस | आद्य |
20. पूर्वाषाढा | शुक्र | ब्राह्मण | उग्र / अधो | भूधाफाढा | धनु (गुरु) | क्षत्रिय / द्विपद | बाँदर / बोका | नर | मध्य |
21. उत्तराषाढा | सूर्य | क्षत्रिय | ध्रुव / ऊर्ध्व | भेभोजाजी | धनु / मकर (गुरु / शनि) | क्षत्रिय / वैश्य (द्विपद / जलचर) | नकुल / सर्प | नर | अन्त्य |
22. श्रवण | चन्द्र | चाण्डाल | चर / ऊर्ध्व | खीखूखेखो | मकर (शनि) | वैश्य / जलचर | बाँदर / बोका | देव | अन्त्य |
23. धनिष्ठा | मंगल | कृषक | चर / ऊर्ध्व | गागीगुगे | मकर / कुम्भ (शनि) | वैश्य / शूद्र (जलचर / द्विपद) | सिंह / हात्ती | राक्षस | मध्य |
24. शतभिषा | राहु | कूरजाति | चर / ऊर्ध्व | गोसासीसू | कुम्भ (शनि) | शूद्र / द्विपद | घोडा / राँगो | राक्षस | आद्य |
25. पूर्वाभाद्रपदा | गुरु | ब्राह्मण | उग्र / अधो | सेसोदादी | कुम्भ / मीन (शनि / गुरु) | शूद्र / विप्र (द्विपद / जलचर) | सिंह / हात्ती | नर | आद्य |
26. उत्तराभाद्रपदा | शनि | क्षत्रिय | ध्रुव / ऊर्ध्व | दूथझञ | मीन (गुरु) | विप्र / जलचर | गाई / बाघ | नर | मध्य |
27. रेवती | बुध | शूद्र | मृदु / तिर्यङ् | देदोचची | मीन (गुरु) | विप्र / जलचर | हात्ती / सिंह | देव | अन्त्य |
अवकहडा चक्र — चक्र दृश्य
बाहिरबाट भित्र: नक्षत्र → नामाक्षर (१०८ चरण) → राशि → स्वामी → वर्ण → वश्य → योनि → गण → नाडी
भौमदोष (मङ्गली) विचार
नामाक्षर वर्ग र शत्रु वर्ग
- गरुड⚔सर्प
- मार्जार⚔मूषक
- सिंह⚔मृग
- श्वान⚔मेष
वर र वधूको नामाक्षर वर्ग परस्पर शत्रु परेमा भौमदोष (मङ्गली) मानिन्छ।
श्लोक
लग्ने (१) व्यये (१२) च पाताले (४) जामित्रे (७) चाष्टमे (८) कुजे। पत्नीं हन्ति स्वभर्तारं भर्ता भार्यां न संशयः॥
जामित्रे च यदा सौरिर्लग्ने वा हिबुकेऽथ वा। नवमे द्वादशे चैव भौमदोषो न विद्यते॥
चन्द्रभृगू द्वितीये न मङ्गली, यस्य जीवः। न मङ्गली केन्द्रगते च राहौ, र्न मङ्गली मङ्गलराहुयोगे॥
टिप्पणी: मङ्गल लग्न, ४, ७, ८ वा १२ भावमा परेमा भौमदोष लाग्छ; शनि दृष्टि, गुरु/शुक्र/चन्द्रको स्थिति, केन्द्रगत राहु आदिले दोष परिहार हुन सक्छ (माथिका श्लोक हेर्नुहोस्)।