अवकहडा चक्र
२७ नक्षत्र, १०८ चरण — स्वामी, जात, संज्ञा, मुखा, नामाक्षर, राशि, वर्ण, वश्य, योनि, गण र नाडीको परम्परागत तालिका।
अभिजित् — उत्तराषाढाको चौथो पाउ र श्रवणको सुरुको १५ भागमध्ये १ भाग मिलेर बन्ने अन्तरकालीन (२८औँ) नक्षत्र हो; नामाक्षर: जु, जे, जो, ख।
| नक्षत्र | स्वामी | जात | संज्ञा | मुख | नामाक्षर (चरण १–४) | राशि | राशि स्वामी | वर्ण | वश्य | योनि | वैरि योनि | गण | नाडी |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
1. अश्विनी | अ.क. | वैश्य | ल. | तिर्यङ | चूचेचोला | मेष | मंगल | क्षत्रिय | चतुष्पद | घोडा | रांगो | देव | आध्य |
2. भरणी | यम | चाण्डाल | क्षि. | अधो | लीलूलेलो | मेष | मंगल | क्षत्रिय | चतुष्पद | हात्ती | सिंह | नर | मध्य |
3. कृत्तिका | अग्नि | ब्राम्हण | उ.कू. | अधो | अईउए | मेष / वृष | मंगल / शुक्र | क्षत्रिय / वैश्य | चतुष्पद | बोका | बाँदर | राक्षस | अन्त्य |
4. रोहिणी | ब्रम्हा | शूद्र | मि.सा. | ऊर्ध्व | ओवावीवू | वृष | शुक्र | वैश्य | चतुष्पद | सर्प | नकुल | नर | अन्त्य |
5. मृगशिरा | चन्द्र | कृषक | धु.स्थि. | तिर्यङ | वेवोकाकी | वृष / मिथुन | शुक्र / बुध | वैश्य / शूद्र | चतुष्पद / द्विपद | सर्प | नकुल | देव | मध्य |
6. आर्द्रा | शिव | करजाति | म.मै. | ऊर्ध्व | कुघङछ | मिथुन | बुध | शूद्र | द्विपद | कुकुर | हरिण | नर | आध्य |
7. पुनर्वसु | अदिति | वैश्य | ती.दा. | तिर्यङ | केकोहाही | मिथुन / कर्क | बुध / चन्द्र | शूद्र / विप्र | द्विपद / जलचर | बिरालो | मुसा | देव | आध्य |
8. पुष्य | वृहस्पति | क्षत्रिय | च.च. | ऊर्ध्व | हुहेहोडा | कर्क | चन्द्र | विप्र | जलचर | बोका | बाँदर | देव | मध्य |
9. आश्रेषा | सर्प | चाण्डाल | ल.क्षि. | अधो | डीडूडेडो | कर्क | चन्द्र | विप्र | जलचर | बिरालो | मुसा | राक्षस | अन्त्य |
10. मघा | पितर | शूद्र | ती.दा. | अधो | मामीमूमे | सिंह | सूर्य | क्षत्रिय | वनचर | मुसा | बिरालो | राक्षस | अन्त्य |
11. पूर्वाफाल्गुनी | भग | ब्राम्हण | उ.क. | अधो | मोटाटीटू | सिंह | सूर्य | क्षत्रिय | वनचर | मुसा | बिरालो | नर | मध्य |
12. उत्तराफाल्गुनी | अर्यमा | क्षत्रिय | उ.क. | ऊर्ध्व | टेटोपापी | सिंह / कन्या | सूर्य / बुध | क्षत्रिय / वैश्य | वनचर / द्विपद | गाई | बाघ | नर | आध्य |
13. हस्त | सूर्य | वैश्य | ध्रु.स्थि. | तिर्यङ | पूषणठ | कन्या | बुध | वैश्य | द्विपद | रांगो | घोडा | देव | आध्य |
14. चित्रा | विश्वकर्मा | कृषक | ल.क्षि. | तिर्यङ | पेपोरारी | कन्या / तुला | बुध / शुक्र | वैश्य / शूद्र | द्विपद | बाघ | गाई | राक्षस | मध्य |
15. स्वाती | वायु | कूरजाति | म.मै. | तिर्यङ | रूरेरोता | तुला | शुक्र | शूद्र | द्विपद | रांगो | घोडा | देव | अन्त्य |
16. विशाखा | इन्द्राग्नि | चाण्डाल | च.च. | अधो | तीतूतेतो | तुला / वृश्चिक | शुक्र / मंगल | शूद्र / विप्र | द्विपद / कीट | बाघ | गाई | राक्षस | अन्त्य |
17. अनुराधा | मित्र | शूद्र | मि.सा. | तिर्यङ | नानीनूने | वृश्चिक | मंगल | विप्र | कीट | हरिण | कुकुर | देव | मध्य |
18. ज्येष्ठा | इन्द्र | कृषक | मु.मै. | तिर्यङ | नोयायीयू | वृश्चिक | मंगल | विप्र | कीट | हरिण | कुकुर | राक्षस | आध्य |
19. मूल | राक्षस | करजाति | ती.दा. | अधो | येयोभाभी | धनु | गुरु | क्षत्रिय | द्विपद | कुकुर | हरिण | राक्षस | आध्य |
20. पूर्वाषाढा | जल | ब्राम्हण | ती.दा. | अधो | भूधाफाढा | धनु | गुरु | क्षत्रिय | द्विपद | बाँदर | बोका | नर | मध्य |
21. उत्तराषाढा | विश्वदेव | क्षत्रिय | उ.कू. | ऊर्ध्व | भेभोजाजी | धनु / मकर | गुरु / शनि | क्षत्रिय / वैश्य | द्विपद / जलचर | नकुल | सर्प | नर | अन्त्य |
22. श्रवण | विष्णु | चाण्डाल | धू.स्थि. | ऊर्ध्व | खीखूखेखो | मकर | शनि | वैश्य | जलचर | बाँदर | बोका | देव | अन्त्य |
23. धनिष्ठा | वसु | कृषक | च.च. | ऊर्ध्व | गागीगुगे | मकर / कुम्भ | शनि | वैश्य / शूद्र | जलचर / द्विपद | सिंह | हात्ती | राक्षस | मध्य |
24. शतभिषा | वरुण | करजाति | च.च. | ऊर्ध्व | गोसासीसू | कुम्भ | शनि | शूद्र | द्विपद | घोडा | रांगो | राक्षस | आध्य |
25. पूर्वाभाद्रपदा | अजेकपा | ब्राम्हण | च.च. | अधो | सेसोदादी | कुम्भ / मीन | शनि / गुरु | शूद्र / विप्र | द्विपद / जलचर | सिंह | हात्ती | नर | आध्य |
26. उत्तराभाद्रपदा | अहिध्य | क्षत्रिय | उ.कू. | ऊर्ध्व | दूथझञ | मीन | गुरु | विप्र | जलचर | गाई | बाघ | नर | मध्य |
27. रेवती | पूषा | शूद्र | म.मै. | तिर्यङ | देदोचची | मीन | गुरु | विप्र | जलचर | हात्ती | सिंह | देव | अन्त्य |
अवकहडा चक्र — चक्र दृश्य
बाहिरबाट भित्र: नक्षत्र → नामाक्षर (१०८ चरण) → राशि → स्वामी → वर्ण → वश्य → योनि → गण → नाडी
भौमदोष (मङ्गली) विचार
नामाक्षर वर्ग र शत्रु वर्ग
- गरुड⚔सर्प
- मार्जार⚔मूषक
- सिंह⚔मृग
- श्वान⚔मेष
वर र वधूको नामाक्षर वर्ग परस्पर शत्रु परेमा भौमदोष (मङ्गली) मानिन्छ।
श्लोक
लग्ने (१) व्यये (१२) च पाताले (४) जामित्रे (७) चाष्टमे (८) कुजे। पत्नीं हन्ति स्वभर्तारं भर्ता भार्यां न संशयः॥
जामित्रे च यदा सौरिर्लग्ने वा हिबुकेऽथ वा। नवमे द्वादशे चैव भौमदोषो न विद्यते॥
चन्द्रभृगू द्वितीये न मङ्गली, यस्य जीवः। न मङ्गली केन्द्रगते च राहौ, र्न मङ्गली मङ्गलराहुयोगे॥
टिप्पणी: मङ्गल लग्न, ४, ७, ८ वा १२ भावमा परेमा भौमदोष लाग्छ; शनि दृष्टि, गुरु/शुक्र/चन्द्रको स्थिति, केन्द्रगत राहु आदिले दोष परिहार हुन सक्छ (माथिका श्लोक हेर्नुहोस्)।