पञ्चाङ्ग गणना कसरी हुन्छ
ग्रहपात र काल मापनदेखि सूर्योदय, सङ्क्रान्ति, तिथि, नक्षत्र, योग र करणसम्म — अनि स्थानले उत्तर किन बदल्छ।
हामी यो कसरी गणना गर्छौं
सारांश
भारी खगोलशास्त्र र पञ्चाङ्ग गणना नेपाली-होलिडे-एपीआई (फास्टएपीआई + स्विस एफेमेरिस / जेपीएल, लाहिरी अयनांश) मा हुन्छ। रियाक्ट एप वेदिक पात्रो एपीआई बोलाएर लेबल देखाउँछ — उही ग्रहपात फेरि चलाउँदैन।
राशि भनेको के?
राशि भनेको क्रान्तिवृत्त मार्गमा बाँडिएका १२ बराबर खण्ड, प्रत्येक ३०° — मेष ०° देखि मीन ३५०°–३६०° सम्म। यो निरयन चक्र तारापुञ्जसँग जोडिएको छ; पश्चिमी राशिफलको “सूर्य राशि” प्रायः सायन हुन्छ, नेपाली पात्रो/पञ्चाङ्ग निरयन।
कक्षा (क्रान्तिवृत्त)
सूर्य, चन्द्र र ग्रहहरू प्रायः एउटै तल्लो कक्षीय तलमा हिँड्छन् — पृथ्वीको वरिपरि “राशि पट्टी” यही कक्षाको ३६०° कोठा हो।
नक्षत्र
उही कक्षामा २७ भाग, प्रत्येक १३°२०′ — चन्द्रको नक्षत्र यही सूक्ष्म जालबाट।
लग्न
पूर्व क्षितिजमा उदाउँदै गरेको कक्षीय बिन्दु — तपाईंको अक्षांश, देशान्तर र घण्टाअनुसार ग्रहपातबाट लग्न कोण निकालिन्छ।
पृथ्वी, कक्षा र राशि–नक्षत्र पट्टी
तलको चित्र भूकेन्द्रित दृश्य हो: पृथ्वी बीचमा, सूर्य दूर (दिशा मात्र), चन्द्रको कक्ष, र बाहिर १२ राशि + २७ नक्षत्र को जाल — सूर्यको निरयन देशान्तर अनुसार कुन खण्ड उज्यालो हुन्छ हेर्नुहोस्। वर्ष स्लाइडर / चलाउनुहोस् ले सूर्यलाई पट्टीमा सार्छ; पढाइमा सूर्य राशि, नक्षत्र, तिथि कोण (चन्द्र−सूर्य) देखिन्छ — यही कोण सर्भरमा तिथि बनाउँछ।
बाहिरी १२ राशि र २७ नक्षत्रको ग्रिडले पृथ्वीबाट देखिने सूर्यको स्थिति देखाउँछ — सूर्य नयाँ राशि वा नक्षत्रमा प्रवेश गर्दा ग्रिड सीमा पार हुन्छ (सङ्क्रान्ति)। पृथ्वीले सूर्यको १ फेरो (~३६५ दिन) लगाउँदा चन्द्रले ~१२.४ फेरो लगाउँछ — त्यसैले १२ चान्द्र महिना सकिँदा वर्ष ~११ दिन बाँकी रहन्छ, जसले अधिक मासजन्माउँछ।
यो चित्र शिक्षाका लागि सरलीकृत कक्ष हो; उत्पादनमा स्विस एफेमेरिसले जेपीएल ग्रहपात, अपवर्तन र अवलोककको उचाइ प्रयोग गर्छ।
झुकाव, विषुव र अयन चलन
पृथ्वीको धुरी ≈ २३°२६′ ले कक्षासँग झुकिएको छ — त्यसैले वसन्त/शरद विषुव र ग्रीष्म/हेमन्त अयनान्त बन्छन्। अक्ष लट्टु झैँ २६,००० वर्ष को शंकुमा डुल्दा विषुव बिन्दु तारापुञ्ज माथि पछाडि सर्छ — अयनांश (लाहिरी)। एपीआईमा प्रत्येक क्षणको लाहिरी अयनांश स्विस एफेमेरिसबाट; दैनिक पेलोडमा उदय जुलियन दिनमा पनि लेखिन्छ।
पहिलो ठूलो चित्र: निरयन राशि चक्र स्थिर, विषुवत् रेखा र विषुव काट अयन चलन सँग घुम्छ। दोस्रो: ध्रुव तारा बदल्दै अक्ष शंकु — अयनांश किन वर्षेनि बढ्छ।
बाहिरी १२ राशि ताराका सापेक्ष स्थिर छन् (निरयन)। पृथ्वीको अक्ष लट्टू झैँ घुम्दा वसन्त-विषुव (Point 0) बिस्तारै राशिचक्रमा पछाडि सर्छ — प्रति ~७२ वर्षमा १°। त्यसैले आज विषुव मीन मा छ, अनि सायन ऋतु निरयन महिनासँग बिस्तारै फरक पर्दै जान्छ।
पृथ्वीको अक्ष २३.५° झुकेरै रहन्छ तर लठ्ठाझैँ क्रान्तिवृत्त ध्रुव वरिपरि बिस्तारै घुम्छ — पूरा एक फेरो ~२६,००० वर्ष। त्यसैले उत्तर ध्रुवले फरक-फरक ध्रुव तारा देखाउँछ — कुनै बेला थुबन, अहिले ध्रुव, र ~१३,७८४ बि.सं. मा अभिजित। ऋतु-आधारित विषुव रेखा राशिचक्रमा घुम्दै जान्छ — यही अयन चलन ले माथिको अयनांश खाँडो बढाउँछ।
आधार — स्थान, समय, ग्रहपात
हरेक गणना एउटै सूत्रबाट सुरु हुन्छ: अवलोककको स्थान (अक्षांश, देशान्तर, समय क्षेत्र, उचाइ), नागरिक दिन (ग्रेगोरियन, ई.पू., वा बि.सं. ठेगाना), र त्यो दिनको जुलियन दिन। स्थानीय घडी आईएएनए समय क्षेत्रबाट; उदय/अस्तका लागि साँचो क्षितिज, अपवर्तन र क्षितिज झुकाव समावेश।
स्विस एफेमेरिस (जेपीएल)
सूर्य, चन्द्र, ग्रह, पातका ज्यामितीय स्थान — गति, उदय/अस्त, अयनांश सहित। सबै निरयन देशान्तर लाहिरी अयनांश घटाएर।
उदय–आधारित दिन
पात्रो/पञ्चाङ्गको मुख्य दिन = स्थानीय सूर्योदयदेखि अर्को सूर्योदयसम्म (वैकल्पिक: नागरिक मध्यरातको झलक)।
सङ्क्रान्ति
निरयन सूर्य जब ०°, ३०°, ६०°… काट्छ — द्विभाजनले काट्ने क्षण खोजिन्छ; मेष/मकर वर्षारम्भ र ऋतु यहीबाट।
| # | राशि | ° | स्वामी | तत्त्व |
|---|---|---|---|---|
| १ | मेष | ०°–३०° | मङ्गल | अग्नि |
| २ | वृष | ३०°–६०° | शुक्र | पृथ्वी |
| ३ | मिथुन | ६०°–९०° | बुध | वायु |
| ४ | कर्कट | ९०°–१२०° | चन्द्र | जल |
| ५ | सिंह | १२०°–१५०° | सूर्य | अग्नि |
| ६ | कन्या | १५०°–१८०° | बुध | पृथ्वी |
| ७ | तुला | १८०°–२१०° | शुक्र | वायु |
| ८ | वृश्चिक | २१०°–२४०° | मङ्गल | जल |
| ९ | धनु | २४०°–२७०° | गुरु | अग्नि |
| १० | मकर | २७०°–३००° | शनि | पृथ्वी |
| ११ | कुम्भ | ३००°–३३०° | शनि | वायु |
| १२ | मीन | ३३०°–३६०° | गुरु | जल |
| # | नक्षत्र | ° | स्वामी | चिह्न | पद १ | पद २ | पद ३ | पद ४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | अश्विनी | ०°२०′–१३°२०′ | केतु | घोडाको शिर | चू | चे | चो | ला |
| २ | भरणी | १३°२०′–२६°२०′ | शुक्र | योनि | ली | लू | ले | लो |
| ३ | कृत्तिका | २६°२०′–३९°२०′ | सूर्य | ज्वाला | अ | ई | उ | ए |
| ४ | रोहिणी | ३९°२०′–५२°२०′ | चन्द्र | गोरुगाडा | ओ | वा | वी | वू |
| ५ | मृगशीर्षा | ५२°२०′–६५°२०′ | मङ्गल | मृगको शिर | वे | वो | का | की |
| ६ | आर्द्रा | ६५°२०′–७८°२०′ | राहु | आँसुको थोपा | कु | घ | ङ | छ |
| ७ | पुनर्वसु | ७८°२०′–९१°२०′ | गुरु | धनुष र वाण | के | को | हा | ही |
| ८ | पुष्य | ९१°२०′–१०४°२०′ | शनि | फूल | हू | हे | हो | डा |
| ९ | आश्रेषा | १०४°२०′–११७°२०′ | बुध | सर्प | डी | डू | डे | डो |
| १० | मघा | ११७°२०′–१३०°२०′ | केतु | राजसिंहासन | मा | मी | मू | मे |
| ११ | पूर्व फाल्गुनी | १३०°२०′–१४३°२०′ | शुक्र | झुल्ने खाट | मो | टा | टी | टू |
| १२ | उत्तर फाल्गुनी | १४३°२०′–१५६°२०′ | सूर्य | खाट | टे | टो | पा | पी |
| १३ | हस्त | १५६°२०′–१६९°२०′ | चन्द्र | हात | पू | ष | ण | ठ |
| १४ | चित्रा | १६९°२०′–१८२°२०′ | मङ्गल | मोती | पे | पो | रा | री |
| १५ | स्वाति | १८२°२०′–१९५°२०′ | राहु | हावामा हल्लिने टुसा | रू | रे | रो | ता |
| १६ | विशाखा | १९५°२०′–२०८°२०′ | गुरु | कुमालेको चक्र | ती | तू | ते | तो |
| १७ | अनुराधा | २०८°२०′–२२१°२०′ | शनि | कमलको फूल | ना | नी | नू | ने |
| १८ | ज्येष्ठा | २२१°२०′–२३४°२०′ | बुध | छाता | नो | या | यी | यू |
| १९ | मूल | २३४°२०′–२४७°२०′ | केतु | जराको मुठा | ये | यो | भा | भी |
| २० | पूर्वाषाढा | २४७°२०′–२६०°२०′ | शुक्र | हाते पंखा | भू | धा | फा | ढा |
| २१ | उत्तराषाढा | २६०°२०′–२७३°२०′ | सूर्य | हात्तीको दाँत | भे | भो | जा | जी |
| २२ | श्रवण | २७३°२०′–२८६°२०′ | चन्द्र | पाइलाहरू | खी | खू | खे | खो |
| २३ | धनिष्ठा | २८६°२०′–२९९°२०′ | मङ्गल | बाँसुरी | गा | गी | गु | गे |
| २४ | शतभिषा | २९९°२०′–३१२°२०′ | राहु | खाली वृत्त · सय तारा | गो | सा | सी | सू |
| २५ | पूर्वभाद्रपदा | ३१२°२०′–३२५°२०′ | गुरु | तरबार | से | सो | दा | दी |
| २६ | उत्तरभाद्रपदा | ३२५°२०′–३३८°२०′ | शनि | जोडी सर्प | दू | थ | झ | ञ |
| २७ | रेवती | ३३८°२०′–३५१°२०′ | बुध | मृदङ्ग | दे | दो | चा | ची |
पञ्चाङ्ग कसरी गणना हुन्छ
पञ्चाङ्गका अङ्ग सबै निरयन देशान्तरबाट — चन्द्र र सूर्यको कोणीय अन्तर वा जोड। उदय तिथि = तपाईंको स्थानमा सूर्योदय भएको क्षणमा; नक्षत्र/योग/करण पनि उही निरयन देशान्तरबाट।
अङ्ग समाप्ति समय: ग्रहपातमा चन्द्र−सूर्य (वा चन्द्र मात्र) कोण सीमा काट्ने क्षण द्विआधारी खोज — चक्र र समयरेखा यही सीमा जुलियन दिन प्रयोग गर्छ।
| क्रम | के गणना | कसरी |
|---|---|---|
| १ | सूर्योदय, सूर्यास्त, अर्को उदय | स्विस उदय/अस्त — अवलोककको अक्षांश/देशान्तर, अपवर्तन |
| २ | चन्द्र उदय/अस्त | उदयपछिको चन्द्र उदय/अस्त |
| ३ | उदय तिथि, वार | उदय जुलियन दिनमा चन्द्र−सूर्य → तिथि सूचकाङ्क |
| ४ | दिनमान · रात्रिमान | उदय–अस्त–अर्को उदयको अवधि |
| ५ | मध्याह्न, लाहिरी अयनांश | स्थानीय मध्याह्न जुलियन दिन; सूर्योदयमा अयनांश |
| ६ | पक्ष; तिथि/नक्षत्र/योग/करण + अन्त | निरयन सूत्र + सीमा खोज |
| ७ | चान्द्र/पूर्णिमान्त मास | सूर्य–चन्द्र पक्ष नियम; अधिक/क्षय मास |
| ८ | ९ ग्रह उदयमा | प्रत्येक ग्रहको देशान्तर, राशि, नक्षत्र, पद, गति |
| ९ | लग्न अवधि | दिनभर लग्नले ३०° राशि सीमा काट्ने |
| १० | मुहूर्त, चौघडी, होरा | उदय–अर्को उदय विभाजन — परम्परागत खण्ड |
| ११ | सम्वत्सर, बि.सं./ने.सं. | सङ्क्रान्ति वर्ष + चान्द्र मास नियम |
कुनै घण्टामा झलक चाहिन्छ भने उही ग्रहपात क्षणमा अङ्ग पुन: गणना — नागरिक मध्यरात दिन भने दुई उदय पेलोड बीच मिलाइन्छ (देखाउन मात्र, दोस्रो ग्रहपात पास होइन)।
ग्रह गोचर कसरी गणना हुन्छ
गोचर = कुनै क्षणमा प्रत्येक ग्रह कुन निरयन राशि / नक्षत्र / पद मा छ र कहिले अर्को मा प्रवेश गर्छ। पात्रो गोचर सामान्यतः स्थानीय सूर्योदय मा झलक; प्रवेश सूची महिनाभरका काट्ने घटना।
| विषय | गणना |
|---|---|
| वर्तमान स्थिति | प्रत्येक ग्रहको लाहिरी निरयन देशान्तर → राशि (÷३०°), नक्षत्र (÷१३°२०′), पद (÷३°२०′); केतु = राहु + १८०° |
| वक्री / मार्गी | क्रान्तिवृत्तीय देशान्तरको गति चिन्ह — मंगल…शनि; राहु/केतु सधैँ वक्री परम्परा |
| अस्त | ग्रह सूर्य नजिक — कोणीय दूरीको सीमा (ग्रहअनुसार फरक) |
| अर्को राशि प्रवेश | देशान्तर ०°, ३०°, … काट्ने — पहिले मोटो समय खोज, त्यसपछि द्विभाजन (~१५ मिनेट सहिष्णुता) |
| अर्को नक्षत्र / पद | उही द्विभाजन — नक्षत्र सूचकाङ्क वा पद खण्ड परिवर्तन |
| वक्री/मार्गी स्थान | गति चिन्ह फेरिने क्षणको खोज (प्रवेश दायराभित्र) |
| आगामी घटना सूची | चयनित महिनाका ई.सं. सीमाभित्र सबै प्रवेश/स्थान घटना → स्थानीय समय + बि.सं. दिन |
ढिलो र छिटो ग्रह
चन्द्र/बुध छिटो — राशि बदल्न दिन/हप्ता; शनि/राहु महिना/वर्ष। खोज सञ्झ्याल ग्रहअनुसार ठूलो राखिन्छ ताकि वक्री घुम्ती पनि नछुटोस्।
पात्रो र कुण्डली
गोचर पृष्ठ = यात्रा तालिका + प्रवेश; कुण्डली = जन्म क्षण / वर्गीय चार्ट — उही निरयन इन्जिन, फरक अङ्कुर समय।
ग्रहण कसरी गणना हुन्छ
सूर्यग्रहण र चन्द्रग्रहण स्विस एफेमेरिसका समर्पित ग्रहण विधिबाट — ज्यामितीय युति र छाया शंकु, जेपीएल ग्रहपातमाथि। पर्व/पञ्चाङ्ग दृश्यले वर्षभरि गएका र आउने सूची देखाउँछ।
| चरण | के हुन्छ |
|---|---|
| विश्वव्यापी चरम | अर्को/अघिल्लो ग्रहणको चरम जुलियन दिन — सूर्य: सूर्य–चन्द्र पङ्क्ति; चन्द्र: पूर्णिमा पृथ्वीको छायाँबाट |
| प्रकार | सूर्य: पूर्ण, वलयाकार, मिश्र, आंशिक; चन्द्र: पूर्ण, आंशिक, उपछाया — ग्रहपातको सङ्केतबाट |
| स्थानीय दृश्यता | अवलोकक (देशान्तर, अक्षांश, उचाइ) दिएपछि स्थानीय सम्पर्क समय — केही ठाउँमा आंशिक/पूर्ण देखिन्छ कि छैन |
| स्थानीय सूर्य खोज | विश्वव्यापी चरम नजिक स्थानीय चरम — नदेखिए अर्को ग्रहणसम्म अगाडि |
| स्थानीय चन्द्र | चरम / उपछाया सुरुमा चन्द्र क्षितिजमाथि — देखिने झण्डा |
| पात्रो प्रदर्शन | नेपाली लेबल, बि.सं./ई.सं. मिति, त्यो नागरिक दिनको दैनिक पञ्चाङ्ग लिङ्क |
ग्रहण समय विश्वव्यापी समय/जुलियन दिनमा शुद्ध; स्थानीय पात्रो मिति = तपाईंको समय क्षेत्र + वैदिक सूर्योदय नियम (उदयअघिको रात्रि घटना अघिल्लो पञ्चाङ्ग दिनमा) जहाँ लागू हुन्छ।
यो वेबसाइट के देखाउँछ
वेदिक पात्रो मुख्यतया एपीआईबाट आएको गणित स्वरूप गर्छ — नेपाली अङ्क, ठेगाना ब्राउज, लेआउट। तिथि/नक्षत्र समय, उदय/अस्त, ग्रह, गोचर प्रवेश, ग्रहण, मुहूर्त, पर्व, साइत, कुण्डली बल — उत्पादनमा सर्भर-पक्ष ग्रहपातबाट; ब्राउजरले स्थान फेरि गणना गर्दैन।
क्यास भएको वर्ष/दिनपछि सादा प्राप्ति छिटो हुन सक्छ — गणना पहिले नै भइसकेको पेलोड।
शुद्ध काल मापन किन चाहिन्छ
कुन घडीमा गणना गर्ने?
खगोलीय गणनाका लागि “समय” एउटै कुरा होइन। कम्तीमा दुई फरक कालमान चाहिन्छ, र दुईबीचको फरक बेवास्ता गर्दा त्रुटि आउँछ।
UT — विश्वव्यापी समय
पृथ्वीको घुर्णनमा आधारित — हाम्रो नागरिक घडी यही हो। तर पृथ्वीको घुर्णन पूर्ण नियमित छैन।
TT — स्थलीय समय
परमाणु घडीमा आधारित समान कालमान — ग्रहपात (ephemeris) यही मान्छ।
ΔT — दुईबीचको फरक
ΔT = TT − UT। आज झन्डै ~६९ सेकेन्ड; १७०० ई.मा झन्डै ९ सेकेन्ड; १००० ई.मा ~१,५७० सेकेन्ड।
पृथ्वीको घुर्णनले UT दिन्छ, तर त्यो एकनास छैन — त्यसैले गणनाका लागि TT चाहिन्छ।
पृथ्वीको घुर्णन सुस्ताउँदै छ
चन्द्रको ज्वारीय घर्षणले पृथ्वीको घुर्णन बिस्तारै सुस्त पार्दै छ — शताब्दीमा झन्डै १.७ मिलिसेकेन्ड प्रति दिन।
प्रति दिन मिलिसेकेन्ड नगण्य देखिन्छ, तर यो सञ्चित हुन्छ। शताब्दीयौँमा जम्मा हुँदै यो घण्टौँमा पुग्छ — त्यसैले ΔT पुराना मितिमा ठूलो हुन्छ।
पञ्चाङ्गमा यसको असर
आजका मितिका लागि ΔT को ~६९ सेकेन्डले तिथि वा सङ्क्रान्तिको दिन प्रायः बदल्दैन — तर सन्धि समय मध्यरात वा सूर्योदयको ठ्याक्कै सिमानामा परे बदल्न सक्छ।
पुराना बि.सं. मितिका लागि भने यो निर्णायक हुन्छ। ΔT बेवास्ता गरेर १००० ई.को सङ्क्रान्ति गणना गर्दा २६ मिनेटको त्रुटि आउँछ — र त्यो मध्यरात नजिक परे गते नै एक दिन फरक हुन्छ।
Swiss Ephemeris ले ΔT भित्रै सम्हाल्छ, त्यसैले engine ले UT मा क्षण दिँदा पनि ग्रहपातले सही TT मा गणना गर्छ। तर यो मौन रूपमा हुने भएकाले बिर्सन सजिलो छ — र आफ्नै सूत्र लेख्दा यही चुक्ने सम्भावना सबैभन्दा बढी हुन्छ।
ΔT को भविष्यको मान भविष्यवाणी गर्न सकिँदैन — पृथ्वीको घुर्णन अनियमित छ, त्यसैले यो अवलोकनबाट मात्र थाहा हुन्छ। यसैले ग्रहपात तालिका समय–समयमा अद्यावधिक गरिन्छ।
सूर्योदय
सूर्योदय — “देखिनु” कहिले हो?
सूर्योदय गणना गर्नुअघि परिभाषा चाहिन्छ। सूर्यको केन्द्र क्षितिजमा आउँदा, कि माथिल्लो किनारा देखिँदा? र क्षितिज कहाँको — समुद्र सतहको कि तपाईं उभिएको ठाउँको?
मानक परिभाषा: सूर्यको माथिल्लो किनारा वास्तविक क्षितिजमा देखा पर्ने क्षण, वायुमण्डलीय अपवर्तन समेत गणना गरेर। वेदिक पात्रो यही प्रयोग गर्छ।
बिम्बको अर्धव्यास
सूर्य बिन्दु होइन — बिम्ब ~०.२७° को हुन्छ, त्यसैले किनारा केन्द्रभन्दा अगाडि देखिन्छ।
वायुमण्डलीय अपवर्तन
क्षितिजमा हावाले प्रकाश ~०.५७° बङ्ग्याउँछ — सूर्य वास्तवमा तल हुँदै देखिन्छ।
क्षितिजको झुकाव
उचाइमा उभिँदा क्षितिज तल सर्छ — काठमाडौँ (~१,४०० मि) मा सूर्योदय केही अगाडि हुन्छ।
सूर्योदयको क्षण स्थानसापेक्ष — अक्षांश, देशान्तर र उचाइ तीनैले सार्छ।
आधारभूत सूत्र
सिद्धान्ततः सूर्योदय घण्टा कोण बाट निस्कन्छ — अक्षांश र सूर्यको क्रान्ति दिइएपछि।
- φ
- स्थानको अक्षांश
- δ
- सूर्यको क्रान्ति — वर्षभरि ±२३.४४° झुल्ने
- h₀
- −०.८३३° — सूर्यको बिम्ब र वायुमण्डलीय अपवर्तनको भत्ता
- H
- घण्टा कोण — मध्याह्नदेखि उदय/अस्तसम्मको आधा दिन
h₀ शून्य नभई ऋणात्मक हुनुले नै सूर्योदय ज्यामितीय क्षितिजभन्दा केही मिनेट अगाडि पार्छ।
तर यो सूत्र अनुमानित हो। सूर्यको क्रान्ति दिनभरि बदलिन्छ, त्यसैले “सूर्योदयको बेलाको क्रान्ति” जान्न सूर्योदयको समय नै चाहिन्छ — वृत्ताकार निर्भरता। यसैले पुनरावृत्ति आवश्यक हुन्छ।
वेदिक पात्रोले के गर्छ
सूत्र आफैँ लागू गर्नुको सट्टा engine ले Swiss Ephemeris को rise_trans_true_hor प्रयोग गर्छ — जसले वास्तविक क्षितिज, अपवर्तन र बिम्ब सबै एकैसाथ सम्हाल्छ।
- गणना स्थानीय मध्यरातबाट सुरु हुन्छ — अवलोकनकर्ताको समय क्षेत्रमा, र त्यसलाई जुलियन दिनमा बदलिन्छ।
- इनपुट: देशान्तर, अक्षांश, उचाइ, वायुमण्डलीय चाप र तापक्रम — अपवर्तन यिनैले तय गर्छ।
- उचाइबाट क्षितिज झुकाव निकालेर छुट्टै पठाइन्छ, ताकि पहाडी स्थानको सूर्योदय सही आओस्।
यही कारण वेदिक पात्रोमा स्थान छान्दा अक्षांश–देशान्तर मात्र होइन, उचाइ र समय क्षेत्र पनि चाहिन्छ। सूर्योदय पञ्चाङ्गको दिन–सीमा भएकाले यसको शुद्धताले तिथि, वार र पर्वको दिन सबै तय गर्छ।
सूर्यास्त
सूर्यास्त — उदयकै ऐना
सूर्यास्तको गणना सूर्योदयकै हो, केवल घण्टा कोण जोडिन्छ — घटाइँदैन। परिभाषा पनि ऐनामा उभिन्छ: सूर्यको माथिल्लो किनारा क्षितिजमुनि हराउने क्षण।
“झन्डै” किन? किनभने दिनभरि सूर्यको क्रान्ति बदलिन्छ। बिहान र बेलुकाको क्रान्ति अलिकति फरक हुन्छ, त्यसैले सम्मिति पूर्ण हुँदैन — विशेष गरी विषुव वरिपरि, जहाँ क्रान्ति सबैभन्दा छिटो बदलिन्छ।
दिनमान र रातिमान
सूर्योदयदेखि सूर्यास्तसम्मको अवधिलाई दिनमान, र सूर्यास्तदेखि अर्को सूर्योदयसम्मको अवधिलाई रातिमान भनिन्छ। पञ्चाङ्गका कैयन् गणना यी दुईलाई भाग गरेर बन्छन्।
| एकाइ | कसरी बन्छ |
|---|---|
| होरा | दिनमान ÷ १२ र रातिमान ÷ १२ — त्यसैले होरा ठ्याक्कै ६० मिनेटको हुँदैन। |
| मुहूर्त | दिनमान ÷ १५ — दिनका पन्ध्र मुहूर्त। |
| राहुकाल | दिनमानलाई आठ भागमा बाँडेर, वारअनुसार एउटा भाग। |
| प्रहर | दिनमान ÷ ४ र रातिमान ÷ ४ — आठ प्रहर। |
यसैले यी सबै एकाइ लचिला हुन्छन् — गर्मीमा दिनको होरा लामो र रातको छोटो; जाडोमा उल्टो। स्थिर ६० मिनेटको घण्टा आधुनिक अवधारणा हो।
सन्ध्याकाल
सूर्यास्तपछि आकाश तुरुन्तै अँध्यारो हुँदैन। खगोलशास्त्रले सन्ध्याकालका तीन चरण छुट्याउँछ, सूर्य क्षितिजभन्दा कति तल छ भन्ने आधारमा।
परम्परागत रूपमा सन्ध्या पूजाको समय सूर्यास्तको वरिपरिको यही सङ्क्रमण अवधि हो — न पूरै दिन, न पूरै रात।
चन्द्रोदय र चन्द्रास्त
चन्द्रोदय — सूर्योदयभन्दा गाह्रो
गणनाको ढाँचा सूर्यकै हो, तर चन्द्रले तीन थप जटिलता ल्याउँछ।
छिटो गति
चन्द्र दिनको १३° सर्छ — उदयको खोजी गर्दै गर्दा लक्ष्य आफैँ सर्दै हुन्छ।
लम्बन
चन्द्र नजिक भएकाले पृथ्वीको कुन ठाउँबाट हेर्ने भन्नेले स्थान ~१° सम्म फरक पार्छ।
कक्ष झुकाव
चन्द्र क्रान्तिवृत्तबाट ±५° भड्किन्छ, त्यसैले क्रान्ति सूर्यको भन्दा फराकिलो दायरामा चल्छ।
यी तीनैका कारण चन्द्रोदयको समय Swiss Ephemeris को उही rise_trans_true_hor ले निकालिन्छ — तर पिण्डका रूपमा चन्द्र दिएर, र engine ले लम्बन र झुकाव भित्रै सम्हाल्छ।
कुनै दिन चन्द्रोदय हुँदैन
चन्द्र हरेक दिन झन्डै ५० मिनेट ढिलो उदाउँछ, किनभने यो आफ्नै कक्षमा अघि बढिसकेको हुन्छ। अर्थात् चन्द्रको “दिन” २४ घण्टा ५० मिनेटको हुन्छ।
यसको परिणाम रोचक छ — महिनामा एक पटक कुनै नागरिक दिनमा चन्द्रोदय नै हुँदैन, र अर्को दिन दुई पटक हुन सक्छ। २४ घण्टाको सञ्झ्यालमा २४ घण्टा ५० मिनेटको चक्र अटाउन खोज्दाको स्वाभाविक परिणाम।
यसैले engine ले “यो मितिको चन्द्रोदय” भन्ने प्रश्नलाई कहिलेकाहीँ “सूर्योदयपछिको पहिलो चन्द्रोदय” मा बदल्छ — पहिलो प्रश्नको उत्तर सधैँ हुँदैन, दोस्रोको सधैँ हुन्छ।
पर्वमा चन्द्रोदयको भूमिका
कतिपय व्रतमा चन्द्रोदयको ठ्याक्कै समय नै मुख्य कुरा हुन्छ — तिथि होइन।
- तीज र करवा चौथ जस्ता व्रतमा चन्द्र दर्शनपछि मात्र व्रत तोडिन्छ।
- पूर्णिमा मा चन्द्रोदय सूर्यास्तसँगै हुन्छ — यही कारण पूर्णिमाको चन्द्र रातभर आकाशमा रहन्छ।
- औंसी मा चन्द्र सूर्यसँगै उदाउँछ र अस्ताउँछ — त्यसैले देखिँदैन।
- औंसीAunsi
- शुक्ल पक्षको चन्द्रShukla paksha
- प्रथम चौथीFirst quarter
- पूर्णिमाPurnima
- कृष्ण पक्षको चन्द्रKrishna paksha
- अन्तिम चौथीLast quarter
- पुनः औंसीPunah Aunsi
सङ्क्रान्तिको गणना
समस्या — कोण कहिले ठ्याक्कै ३०° को गुणाङ्क हुन्छ?
सङ्क्रान्ति खोज्नु भनेको मूल खोज्नु हो। हामीसँग एउटा फलन छ — कुनै क्षणमा सूर्यको निरयन देशान्तर — र हामी त्यो ३०° को गुणाङ्क छुने क्षण खोज्दै छौँ।
- t
- समय — सामान्यतया जुलियन दिनमा
- 0°
- मेष सङ्क्रान्ति — बैशाख १
- 270°
- मकर सङ्क्रान्ति — माघ १
कोण ३६०° मा बेरिने हुनाले सिधै घटाउ काम लाग्दैन — ३५९° र १° बीचको फरक −३५८° होइन, +२° हो। त्यसैले engine ले कोणीय त्रुटि गणना गर्छ, जसले यो बेरिने समस्या सम्हाल्छ।
ब्रेन्ट विधि, द्विभाजन सहित
वेदिक पात्रोको इन्जिनले ब्रेन्टको विधि प्रयोग गर्छ — द्विभाजनको निश्चित अभिसरण र सेकेन्ट विधिको गतिलाई जोड्ने एक मानक अङ्कगणितीय विधि।
- पहिले एउटा कोष्ठ (bracket) चाहिन्छ — दुई क्षण जहाँ फलनको चिन्ह विपरीत होस्, अर्थात् बीचमा सङ्क्रान्ति निश्चित छ।
- चिन्ह विपरीत नभेटिए engine द्विभाजनमा फर्किन्छ — ढिलो, तर सधैँ काम गर्ने।
- पुनरावृत्ति `६०` सेकेन्डको सहनशीलतामा रोकिन्छ; JD-आधारित संस्करणले १ सेकेन्डसम्म जान्छ।
- अधिकतम ५०–६० पुनरावृत्ति — व्यवहारमा दर्जनभन्दा कम लाग्छ।
हरेक पुनरावृत्तिमा त्यो क्षणको सूर्यको निरयन देशान्तर Swiss Ephemeris बाट निकालिन्छ। अर्थात् गणना एउटै सूत्र समाधान होइन — यो पटक–पटक आकाश सोध्ने प्रक्रिया हो।
क्षणबाट गतेसम्म
सङ्क्रान्तिको ठ्याक्कै क्षण भेटिएपछि अन्तिम चरण बाँकी रहन्छ — त्यसलाई कुन गतेमा राख्ने।
यसका लागि क्षणलाई स्थानीय समयमा बदल्नुपर्छ, र नेपालका लागि त्यो Asia/Kathmandu हो — ऐतिहासिक अफसेट सहित, किनभने नेपालको समय क्षेत्र सधैँ +०५:४५ थिएन।
| अवधि | अफसेट | के थियो |
|---|---|---|
| ≤ 1919 | UTC+05:41:16 | काठमाडौँको माध्य सौर समय |
| 1920–1985 | UTC+05:30 | भारतीय मानक समय |
| ≥ 1986 | UTC+05:45 | नेपाली मानक समय |
पुराना बि.सं. मितिको गणना गर्दा यो फरक पर्छ — १९८५ अघिको सङ्क्रान्ति +०५:४५ मान्दा १५ मिनेट चुक्छ, र त्यो मध्यरातको सिमानामा परे गते नै एक दिन फरक हुन सक्छ।
तिथिको गणना
तिथिको सङ्ख्या — सजिलो भाग
कुनै क्षणको तिथि निकाल्न दुई सङ्ख्या चाहिन्छ — सूर्य र चन्द्रको देशान्तर — र एउटा भाग।
engine मा यो ठ्याक्कै यसरी लेखिएको छ: TITHI_SPAN = 12.0, अनि int(elongation / TITHI_SPAN) + 1। भागको बाँकीले तिथि कति प्रतिशत बितिसक्यो भन्ने दिन्छ।
सन्धि समय — गाह्रो भाग
पञ्चाङ्गले तिथिको नाम मात्र होइन, कहिले सकिन्छ पनि भन्नुपर्छ। यो अर्को मूल-खोज समस्या हो — तर सङ्क्रान्तिभन्दा फरक तरिकाले हल गरिन्छ।
- engine ले वर्तमान क्षणबाट `३०` घण्टाको खोज सञ्झ्याल लिन्छ — कुनै पनि तिथि यत्ति लामो हुँदैन, त्यसैले सन्धि यसभित्रै पर्छ।
- बीचको क्षणमा तिथि गणना गर्छ। उही तिथि भए सन्धि पछाडि छ; फरक भए अगाडि।
- यसरी सञ्झ्याल आधा–आधा गर्दै जान्छ — द्विआधारी खोज, बढीमा ५० पटक।
- सञ्झ्याल `६०` सेकेन्डभन्दा सानो भएपछि रोकिन्छ। त्यही सहनशीलता पञ्चाङ्गमा देखिने शुद्धता हो।
३० घण्टामा ६० सेकेन्डसम्म पुग्न झन्डै ११ पटक आधा गर्नु पर्याप्त हुन्छ (३० घण्टा ÷ २¹¹ ≈ ५३ सेकेन्ड) — त्यसैले वास्तविक पुनरावृत्ति सीमाभन्दा धेरै कम हुन्छ।
अनि दिनमा राख्ने
तिथि र त्यसको सन्धि समय भेटिएपछि अन्तिम प्रश्न बाँकी रहन्छ — आजको तिथि कुन?
उत्तर: सूर्योदयको क्षणमा जुन तिथि चलिरहेको छ, त्यही दिनभरिको तिथि। यसैले तिथि गणनाले सूर्योदय गणनालाई भर पर्छ, र सूर्योदय स्थानसापेक्ष भएकाले तिथि पनि स्थानसापेक्ष बन्छ।
दुई सूर्योदय छोयो
तिथि वृद्धि — एउटै तिथि दुई दिनमा देखिन्छ।
कुनै सूर्योदय छोएन
तिथि क्षय — तिथि पात्रोबाट हराउँछ।
यसैले “तिथि कहिले सकिन्छ” र “आजको तिथि कुन” दुई फरक प्रश्न हुन् — पहिलोको उत्तर खगोलशास्त्रले, दोस्रोको पात्रोको नियमले दिन्छ।
नक्षत्रको गणना
नक्षत्र — एउटै भाग
नक्षत्र पञ्चाङ्गको सबैभन्दा सरल गणना हो — यसलाई सूर्यको स्थान पनि चाहिँदैन। चन्द्रको निरयन देशान्तर मात्र पुग्छ।
engine मा यो NAKSHATRA_SPAN = 360.0 / 27.0 का रूपमा छ। २७ नक्षत्रका नाम एउटा सूचीमा राखिएका छन्, र भागको पूर्णाङ्कले सूचीमा सूचकाङ्क दिन्छ।
चन्द्र छिटो हिँड्छ
चन्द्र दिनको झन्डै १३.२° हिँड्छ, र नक्षत्र १३°२०′ को हुन्छ। त्यसैले चन्द्र प्रत्येक नक्षत्रमा झन्डै एक दिन बस्छ।
सन्धि समय निकाल्ने विधि तिथिकै हो — द्विआधारी खोज, तर सञ्झ्याल केही फरक, किनभने नक्षत्रको अवधि तिथिभन्दा अलि लामो हुन सक्छ।
अभिजित — २८ औँ नक्षत्र
परम्परामा २८ नक्षत्रको उल्लेख पनि भेटिन्छ। थपिने नक्षत्र अभिजित हो, जुन उत्तराषाढा र श्रवणको बीचमा पर्छ।
तर आधुनिक पञ्चाङ्ग गणनामा २७ को विभाजन नै प्रयोग हुन्छ, किनभने २८ ले ३६०° लाई सफा भाग गर्दैन। अभिजितलाई छुट्टै शुभ अवधिका रूपमा राखिन्छ — दिनको मध्याह्न वरिपरिको अभिजित मुहूर्त — नक्षत्र चक्रको भागका रूपमा होइन।
| # | नक्षत्र | ° | स्वामी | चिह्न | पद १ | पद २ | पद ३ | पद ४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | अश्विनी | ०°२०′–१३°२०′ | केतु | घोडाको शिर | चू | चे | चो | ला |
| २ | भरणी | १३°२०′–२६°२०′ | शुक्र | योनि | ली | लू | ले | लो |
| ३ | कृत्तिका | २६°२०′–३९°२०′ | सूर्य | ज्वाला | अ | ई | उ | ए |
| ४ | रोहिणी | ३९°२०′–५२°२०′ | चन्द्र | गोरुगाडा | ओ | वा | वी | वू |
| ५ | मृगशीर्षा | ५२°२०′–६५°२०′ | मङ्गल | मृगको शिर | वे | वो | का | की |
| ६ | आर्द्रा | ६५°२०′–७८°२०′ | राहु | आँसुको थोपा | कु | घ | ङ | छ |
| ७ | पुनर्वसु | ७८°२०′–९१°२०′ | गुरु | धनुष र वाण | के | को | हा | ही |
| ८ | पुष्य | ९१°२०′–१०४°२०′ | शनि | फूल | हू | हे | हो | डा |
| ९ | आश्रेषा | १०४°२०′–११७°२०′ | बुध | सर्प | डी | डू | डे | डो |
| १० | मघा | ११७°२०′–१३०°२०′ | केतु | राजसिंहासन | मा | मी | मू | मे |
| ११ | पूर्व फाल्गुनी | १३०°२०′–१४३°२०′ | शुक्र | झुल्ने खाट | मो | टा | टी | टू |
| १२ | उत्तर फाल्गुनी | १४३°२०′–१५६°२०′ | सूर्य | खाट | टे | टो | पा | पी |
| १३ | हस्त | १५६°२०′–१६९°२०′ | चन्द्र | हात | पू | ष | ण | ठ |
| १४ | चित्रा | १६९°२०′–१८२°२०′ | मङ्गल | मोती | पे | पो | रा | री |
| १५ | स्वाति | १८२°२०′–१९५°२०′ | राहु | हावामा हल्लिने टुसा | रू | रे | रो | ता |
| १६ | विशाखा | १९५°२०′–२०८°२०′ | गुरु | कुमालेको चक्र | ती | तू | ते | तो |
| १७ | अनुराधा | २०८°२०′–२२१°२०′ | शनि | कमलको फूल | ना | नी | नू | ने |
| १८ | ज्येष्ठा | २२१°२०′–२३४°२०′ | बुध | छाता | नो | या | यी | यू |
| १९ | मूल | २३४°२०′–२४७°२०′ | केतु | जराको मुठा | ये | यो | भा | भी |
| २० | पूर्वाषाढा | २४७°२०′–२६०°२०′ | शुक्र | हाते पंखा | भू | धा | फा | ढा |
| २१ | उत्तराषाढा | २६०°२०′–२७३°२०′ | सूर्य | हात्तीको दाँत | भे | भो | जा | जी |
| २२ | श्रवण | २७३°२०′–२८६°२०′ | चन्द्र | पाइलाहरू | खी | खू | खे | खो |
| २३ | धनिष्ठा | २८६°२०′–२९९°२०′ | मङ्गल | बाँसुरी | गा | गी | गु | गे |
| २४ | शतभिषा | २९९°२०′–३१२°२०′ | राहु | खाली वृत्त · सय तारा | गो | सा | सी | सू |
| २५ | पूर्वभाद्रपदा | ३१२°२०′–३२५°२०′ | गुरु | तरबार | से | सो | दा | दी |
| २६ | उत्तरभाद्रपदा | ३२५°२०′–३३८°२०′ | शनि | जोडी सर्प | दू | थ | झ | ञ |
| २७ | रेवती | ३३८°२०′–३५१°२०′ | बुध | मृदङ्ग | दे | दो | चा | ची |
योगको गणना
योग — घटाउ होइन, जोड
तिथि र करणले सूर्य र चन्द्रको फरक प्रयोग गर्छन्। योगले भने जोड — र यही सानो परिवर्तनले पूरै फरक आवधिकता जन्माउँछ।
जोडले के नाप्छ
फरकले चन्द्रको कला दिन्छ — यो सहज छ। तर जोडले के दिन्छ? यसको कुनै सिधा दृश्य अर्थ छैन; यो दुवै पिण्डको संयुक्त गतिको नाप हो।
तिथिमा सूर्यको गति घट्छ (१३.२ − १ = १२.२), योगमा थपिन्छ (१३.२ + १ = १४.२)। त्यसैले योग औसतमा ~२२.६ घण्टामा बदलिन्छ, तिथि ~२३.६ घण्टामा।
व्यवहारमा योग
योग मुख्यतः मुहूर्त छान्दा हेरिन्छ। २७ योगमध्ये केही शुभ मानिन्छन्, केही टार्नुपर्ने।
- शुभ — सिद्धि, शुभ, साध्य, वरीयान् जस्ता योगलाई अनुकूल मानिन्छ।
- टार्नुपर्ने — विष्कम्भ, अतिगण्ड, शूल, गण्ड, व्याघात, वज्र, व्यतीपात, परिघ, वैधृति।
यहाँ ध्यान दिनुपर्ने कुरा — पञ्चाङ्गको योग र ज्योतिषका राजयोग, गजकेसरी योग आदि फरक कुरा हुन्। पहिलो पञ्चाङ्गको पाँचौँ अङ्ग हो; दोस्रो कुण्डलीमा ग्रहको विशेष संयोजन।
| # | योग | ° (≈) |
|---|---|---|
| १ | विष्कम्भ | ०°२०′–१३°२०′ |
| २ | प्रीति | १३°२०′–२६°२०′ |
| ३ | आयुष्मान् | २६°२०′–३९°२०′ |
| ४ | सौभाग्य | ३९°२०′–५२°२०′ |
| ५ | शोभन | ५२°२०′–६५°२०′ |
| ६ | अतिगण्ड | ६५°२०′–७८°२०′ |
| ७ | सुकर्मा | ७८°२०′–९१°२०′ |
| ८ | धृति | ९१°२०′–१०४°२०′ |
| ९ | शूल | १०४°२०′–११७°२०′ |
| १० | गण्ड | ११७°२०′–१३०°२०′ |
| ११ | वृद्धि | १३०°२०′–१४३°२०′ |
| १२ | ध्रुव | १४३°२०′–१५६°२०′ |
| १३ | व्याघात | १५६°२०′–१६९°२०′ |
| १४ | हर्षण | १६९°२०′–१८२°२०′ |
| १५ | वज्र | १८२°२०′–१९५°२०′ |
| १६ | सिद्धि | १९५°२०′–२०८°२०′ |
| १७ | व्यतीपात | २०८°२०′–२२१°२०′ |
| १८ | वरियान् | २२१°२०′–२३४°२०′ |
| १९ | परिघ | २३४°२०′–२४७°२०′ |
| २० | शिव | २४७°२०′–२६०°२०′ |
| २१ | सिद्ध | २६०°२०′–२७३°२०′ |
| २२ | साध्य | २७३°२०′–२८६°२०′ |
| २३ | शुभ | २८६°२०′–२९९°२०′ |
| २४ | शुक्ल | २९९°२०′–३१२°२०′ |
| २५ | ब्रह्म | ३१२°२०′–३२५°२०′ |
| २६ | इन्द्र | ३२५°२०′–३३८°२०′ |
| २७ | वैधृति | ३३८°२०′–३५१°२०′ |
करणको गणना
करण — तिथिको आधा
करणको गणना तिथिकै हो, केवल भाजक आधा — १२° को सट्टा ६°। त्यसैले एक चान्द्र मासमा ६० करण खण्ड हुन्छन्।
६० खण्ड, तर ११ नाम
६० खण्ड छन् तर नाम जम्मा ११। कारण — सात नाम बारम्बार दोहोरिन्छन्, र चार नाम मासमा एक पटक मात्र आउँछन्।
चर करण — ७ नाम
बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि — यी ५६ खण्डमा आठ पटक चक्रमा दोहोरिन्छन्।
स्थिर करण — ४ नाम
शकुनि, चतुष्पद, नाग, किंस्तुघ्न — मासमा एक–एक पटक मात्र, चक्रको दुई छेउमा।
engine मा यही संरचना देखिन्छ: सूचकाङ्क ५७ भन्दा माथि पुगेपछि स्थिर पुच्छर (Shakuni, Chatushpada, Naga) प्रयोग हुन्छ; बाँकीमा सात चर नामको चक्र (index − 1) % 7 ले चल्छ।
| # | करण | प्रकार | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| १ | किंस्तुघ्न | स्थिर | शुक्ल प्रतिपदाको पहिलो आधा — वर्षमा एक पटक |
| २ | बव | चर (७) | महिनाभरि बारम्बार दोहोरिन्छ |
| ३ | बालव | चर (७) | महिनाभरि बारम्बार दोहोरिन्छ |
| ४ | कौलव | चर (७) | महिनाभरि बारम्बार दोहोरिन्छ |
| ५ | तैतिल | चर (७) | महिनाभरि बारम्बार दोहोरिन्छ |
| ६ | गर | चर (७) | महिनाभरि बारम्बार दोहोरिन्छ |
| ७ | वणिज | चर (७) | महिनाभरि बारम्बार दोहोरिन्छ |
| ८ | विष्टि (भद्रा) | चर (७) | महिनाभरि बारम्बार दोहोरिन्छ |
| ९ | चतुष्पद | स्थिर (४) | महिनामा एक–एक पटक — कृष्ण चतुर्दशी, औंसी, शुक्ल प्रतिपदा, पूर्णिमा |
| १० | नाग | स्थिर (४) | महिनामा एक–एक पटक — कृष्ण चतुर्दशी, औंसी, शुक्ल प्रतिपदा, पूर्णिमा |
| ११ | किंस्तुघ्न | स्थिर (४) | महिनामा एक–एक पटक — कृष्ण चतुर्दशी, औंसी, शुक्ल प्रतिपदा, पूर्णिमा |
क्रम: किंस्तुघ्न → (बव…विष्टि)×८ → शकुनि → चतुष्पद → नाग → किंस्तुघ्न — जम्मा ६० करण/महिना।
विष्टि — भद्रा
एघार करणमध्ये विष्टि विशेष रूपमा उल्लेख्य छ, किनभने यसलाई भद्रा भनिन्छ र यस अवधिमा शुभ कार्य गरिँदैन।
विष्टि चर करण भएकाले मासमा आठ पटक आउँछ — झन्डै हरेक चार दिनमा एक पटक, र प्रत्येक पटक करिब आधा दिन रहन्छ। त्यसैले पञ्चाङ्गमा भद्राको सुरु र अन्त्य समय छुट्टै देखाइन्छ।
करण आधा तिथिको भएकाले यसको अवधि पनि तिथिजस्तै लचिलो हुन्छ — ९ देखि १३ घण्टासम्म, चन्द्रको गतिअनुसार।
स्थानले किन फरक पार्छ
पञ्चाङ्ग स्थाननिरपेक्ष हुँदैन
केही खगोलीय परिमाण विश्वव्यापी हुन्छन् — तिथि सुरु हुने क्षण पृथ्वीभरि एउटै हो। तर व्यवहारमा काम लाग्ने कैयन् पञ्चाङ्ग घटना अवलोकनकर्ताको स्थानमा निर्भर हुन्छन्।
- सूर्योदय र सूर्यास्त
- चन्द्रोदय र चन्द्रास्त
- स्थानीय दिनको सीमा
- घटना घट्दा स्थानीय नागरिक मिति कुन थियो
- स्थानीय लग्न र भाव
यी सबै निम्न कुरामा निर्भर हुन्छन्: अक्षांश + देशान्तर + उचाइ + समय क्षेत्र + मिति।
त्यसैले एउटै तिथि काठमाडौँ, मेलबर्न र न्युयोर्कका लागि फरक देखिन सक्छ — घटना एउटै हो, तर स्थानीय सूर्योदय र मितिको परिभाषा फरक।
सूर्योदय किन महत्त्वपूर्ण छ
परम्परागत पञ्चाङ्ग प्रणालीले दैनिक जानकारी बाँड्ने सीमा प्रायः स्थानीय सूर्योदय मान्छ — मध्यरात होइन। वैदिक दिन सूर्योदयदेखि अर्को सूर्योदयसम्म चल्छ।
यसबाट एक महत्त्वपूर्ण छुट्टयाइ निस्कन्छ: खगोलीय घटनाको ठ्याक्कै एक क्षण हुन्छ, तर त्यो घटना कुन पञ्चाङ्ग दिनको भनेर तोक्ने काम पात्रोको दिन–सीमा नियमले गर्छ।
त्यसैले “मध्यरातमा कुन तिथि छ?” भन्ने प्रश्नले “आजको पञ्चाङ्ग तिथि कुन?” भन्ने प्रश्नको उत्तर दिँदैन। दुई फरक प्रश्न हुन्।
सूर्योदय–सीमाले तिथि दिनमा कसरी बाँडिन्छ देखाउँछ — यहाँ एउटै तिथि दुई दिन (वृद्धि) परेको।
व्यवहारमा यसको अर्थ
वेदिक पात्रोले पञ्चाङ्ग देखाउँदा तपाईंले छानेको स्थानको अक्षांश, देशान्तर र समय क्षेत्र प्रयोग गर्छ। स्थान बदल्दा तिथि, सूर्योदय र कहिलेकाहीँ पर्वको दिन पनि बदलिन सक्छ।
विदेशमा बस्ने नेपालीका लागि
नेपालको पात्रो र स्थानीय पात्रो एक दिन फरक पर्न सक्छ — कुन आधार मान्ने आफैँ छान्नुपर्छ।
पर्व र व्रतका लागि
प्रायः परम्परा नेपालको (काठमाडौँ) पञ्चाङ्ग पछ्याउँछ, तर स्थानीय सूर्योदयअनुसार गर्ने प्रचलन पनि छ।
कुण्डली र मुहूर्तका लागि
यहाँ स्थान अनिवार्य हुन्छ — लग्न र भाव पूरै अक्षांश–देशान्तरमा निर्भर छन्।
एउटै आकाश, फरक क्षितिज — यही कारण पञ्चाङ्ग सधैँ “कहाँ” भन्ने प्रश्नसँग जोडिएर आउँछ।
दुई स्थानमा पञ्चाङ्ग किन फरक हुन्छ
एउटै क्षण, फरक उत्तर
पञ्चाङ्गका परिमाणलाई दुई वर्गमा बाँड्न सकिन्छ — जुन विश्वभरि उही हुन्छन्, र जुन स्थानअनुसार बदलिन्छन्।
| परिमाण | स्थाननिरपेक्ष? | किन |
|---|---|---|
| तिथि सकिने क्षण | हो | कोणीय अवस्था — पृथ्वीभरि एउटै। |
| सङ्क्रान्तिको क्षण | हो | सूर्यको देशान्तर सबैका लागि उही। |
| सूर्योदय | होइन | अक्षांश, देशान्तर, उचाइमा निर्भर। |
| आजको तिथि | होइन | सूर्योदयको सीमाले तोक्ने भएकाले। |
| वार | होइन | सूर्योदयबाट सुरु हुने भएकाले। |
| लग्न | होइन | क्षितिज स्थानअनुसार फरक हुने भएकाले। |
ध्यान दिनुहोस् — पहिलो दुई स्थाननिरपेक्ष भए पनि, तिनलाई कुन दिनमा राख्ने भन्ने प्रश्न स्थानसापेक्ष हुन्छ। यही मोडमा भ्रम सुरु हुन्छ।
एउटा ठोस उदाहरण
मानौँ कुनै तिथि UTC मा `२२:००` बजे सकिन्छ। यो क्षण विश्वभरि उही हो — तर दुई सहरमा यसको अर्थ फरक हुन्छ।
यसैले विदेशमा बस्ने नेपालीले कुन पञ्चाङ्ग पछ्याउने भन्ने छनोट गर्नुपर्छ — नेपालको (काठमाडौँको सूर्योदयमा आधारित) कि स्थानीय। दुवै आ–आफ्नो हिसाबले सही हुन्छन्।
वेदिक पात्रोले कसरी सम्हाल्छ
वेदिक पात्रोले स्थानलाई इनपुट मान्छ, स्थिर मान होइन। तपाईंले छानेको स्थानको अक्षांश, देशान्तर, उचाइ र समय क्षेत्रले सबै स्थानसापेक्ष परिमाण पुनः गणना हुन्छन्।
- पूर्वनिर्धारित स्थान काठमाडौँ हो — नेपालको आधिकारिक पात्रोसँग मिल्ने गरी।
- नेपालभित्रका स्थानका लागि Asia/Kathmandu नै प्रयोग हुन्छ, ऐतिहासिक अफसेट सहित — पुराना मितिका लागि +०५:३० वा +०५:४१:१६।
- उचाइ नदिइए अक्षांश–देशान्तरबाट अनुमान गरिन्छ, किनभने पहाडी स्थानमा यसले सूर्योदयमा फरक पार्छ।
छोटोमा: पञ्चाङ्ग आकाशको मात्र होइन, आकाश कहाँबाट हेरिँदै छ भन्ने कुराको पनि विवरण हो।